गलत भक्ति और नास्तिकता

गलत भक्ति हमें नास्तिकता की ओर ले जाती है.....






शास्त्रों के विरुद्ध साधना करने से  मोक्ष प्राप्ति नहीं होती। सूक्ष्मवेद में लिखा है कि :-
गुरूवां गाम बिगाड़े संतो, गुरूवां गाम बिगाड़े।
ऐसे कर्म जीव के ला दिए, फिर झड़ैं नहीं झाड़े।।
भावार्थ है कि वेद ज्ञानहीन तत्वज्ञान से अपरीचित गुरूओं ने गाँव के गाँव
में शास्त्राविरूद्ध ज्ञान व भक्ति का अज्ञान सुनाकर उनको इतना भ्रमित कर दिया
कि वे अब समझाए से भी शास्त्रा विरूद्ध साधना को त्यागने के लिए तैयार नहीं होते।
गीता अध्याय 16 श्लोक 23 में लिखा है कि शास्त्रा विधि त्यागकर मनमाना
आचरण करने से न तो सिद्धि प्राप्त होती है, न सुख प्राप्त होता है और न गति
होती है अर्थात् व्यर्थ साधना है।
दूसरी ओर आप जी ने चुणक ऋषि की कथा में पढ़ा कि ऋषि चुणक जी
को सिद्धियाँ प्राप्त हो गई। पाठकों को यह समझना है कि सिद्धि भक्ति का बाई
प्रोडैक्ट है, जैसे जौं का भी भूस (तूड़ा) होता है जिसमें तुस बहुत होते हैं। पशु
खाता है तो मुख में जख्म कर देते हैं। यह सिद्धि प्राप्त होती है काल ब्रह्म की भक्ति
से जो चुणक ऋषि जी को प्राप्त हुई।
जो शास्त्रा विधि अनुसार भक्ति करने से सिद्धि प्राप्त होती है, वह गेहूँ का
भुस (तूड़ा) समझें जो पशुओं के लिए उपयोगी तथा खाने में सुगम होता है। भावार्थ
है कि शास्त्राविधि अनुसार साधना न करने से जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे साधक
को नष्ट करती हैं क्योंकि अज्ञानतावश ऋषिजन उनका प्रयोग करके किसी की
हानि कर देते हैं, किसी को आशीर्वाद देकर अपनी भक्ति की शक्ति जो ¬ नाम
के जाप से होती है, उसको समाप्त करके फिर से खाली हो जाते हैं।
जैसे चुणक ऋषि जी ने मानधाता चक्रवर्ती राजा की 72 करोड़ सेना का नाश
कर दिया, अपनी भक्ति की सिद्धि भी खो दी। सूक्ष्मवेद में कहा है कि :-
गरीब, बहतर क्षौणी क्षय करी, चुणक ऋषिश्वर एक।
देह धारें जौरा (मृत्यु) फिरैं, सब ही काल के भेष।।
भावार्थ :- ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ ऋषि चुणक जी ने 72 करोड़ सेना का नाश
कर दिया। ये दिखाई तो देते हैं महात्मा, लेकिन जब इनसे 
पाला पड़ता है तो ये
निकलते हैं सर्प जैसे, जरा-सी बात पर श्राप दे देना, किसी से बेमतलब पंगा ले

लेना इनके लिए आम बात होती है।
अवश्य देखें यह विडियो
https://youtu.be/qGKBCSMXzBY


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